जनजातीय विवि कुलपति पैनल में सरकार विरोधी और कम्युनिस्ट घुसपैठ - भाजपा ने उठाई सीबीआई जांच की मांग
अनुपपुर :- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय में कुलपति चयन प्रक्रिया में अत्यंत गंभीर, चिंताजनक और अमरकंटक की अस्मिता पर सीधा प्रहार हैं। चयनित होने वाले कुलपति पैनल में पाँच नाम – प्रो. सथुपति प्रसन्ना श्री, प्रो. बी. बी. मोहंती, प्रो. तेज प्रताप सिंह, प्रो. कपिल देव मिश्रा, और प्रो. राजेन्द्र जी सोनकवड़े – सम्मिलित हैं। इन सभी पर गंभीर नैतिक, वैचारिक, प्रशासनिक और आपराधिक आरोप हैं, और इनकी चयन प्रक्रिया अनेक अनियमितताओं से घिरी है। सबसे दुःखद है कि विश्वविद्यालय की स्थापना को 17 वर्ष पूरे हो गए, फिर भी आज तक मध्यप्रदेश अथवा स्थानीय महाकौशल अंचल या विश्वविद्यालय से एक भी कुलपति का चयन नहीं हुआ है। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी के जिला मीडिया प्रभारी राजेश सिंह ने महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान, उच्च शिक्षा सचिव श्री विनीत जोशी तथा सीबीआई डायरेक्टर श्री प्रवीण सूद को ज्ञापन सौंप कार्यवाही की मांग की है
*संदिग्ध नामों का पैनल वैचारिक षड्यंत्र तथा भविष्य का संकट*
राजेश सिंह ने बताया की चयन समिति द्वारा अनुशंसित सभी पाँचों उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि और गतिविधियाँ गहरे संदेह के घेरे में हैं। प्रो. सथुपति प्रसन्ना श्री ने स्वयं कार्यकारी परिषद सदस्य रहते हुए अपने नाम की अनुशंसा करवाई, जो स्पष्ट रूप से हितों का टकराव है। उनका पूर्व कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि, चर्चित मोदी-विरोधी लेखिकाओं पर किया गया शोध और विश्वविद्यालय में जातिवादी व वैचारिक गुटों के साथ मेलजोल संस्थागत निष्पक्षता पर हमला है। प्रो. बी. बी. मोहंती के खिलाफ पांडिचेरी विश्वविद्यालय में वित्तीय घोटाले और प्रशासनिक अनियमितताओं की सीबीआई जांच लंबित है। प्रो. तेज प्रताप सिंह द्वारा नक्सलवाद के पक्ष में लिखे गए लेख और वक्तव्य राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय हैं। वहीं प्रो. कपिल देव मिश्रा पर उत्पीड़न, वित्तीय अनियमितता, और माननीय उच्च न्यायालय द्वारा आदेशित जांच के मामलों में संलिप्तता जैसे आरोप गंभीर हैं। प्रो. राजेन्द्र जी सोनकवड़े पर डिजिटल धोखाधड़ी और पूर्व प्रशासनिक पद के दुरुपयोग तथा लखनऊ में महिला शिकायत के मामले हैं। यह सब दर्शाता है कि इस पैनल में गंभीर प्रशासनिक पतन, वैचारिक षड्यंत्र, गुटबाजी का स्पष्ट प्रमाण है।
*अमरकंटक धार्मिक एवं जनजातीय क्षेत्र में हो रहा है सुनियोजित षड्यंत्र*
राजेश सिंह ने आगे बताया की स्थापना के बाद से आज तक किसी भी स्थानीय या विश्वविद्यालय से जुड़े प्रतिभाशाली विद्वान को कुलपति के रूप में चयनित न करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। आखिर महाकौशल की धरती की योग्यता और निष्ठा को कब मान्यता दी जाएगी? वर्तमान पैनल में एक भी व्यक्ति न तो विचार से जुड़ा है, न ही महाकौशल अथवा मध्यप्रदेश से। यह स्थानीय प्रतिभाओं के सुनियोजित बहिष्कार का प्रमाण है, भाजपा यह दृढ़ता से मानती है कि किसी भी संस्थान का विकास तभी संभव है जब उसकी जड़ें उस क्षेत्र की पहचान और जरूरतों से जुड़ी हों। महाकौशल को बार-बार वंचित करना एक प्रकार की संवैधानिक और सांस्कृतिक उपेक्षा है तथा कम्युनिस्ट छद्मवेश धारण करके यहाँ कुलपति बनकर जनजातियों के बीच गहरी साजिश करने की योजना बनाए है।
*चयन समिति को निरस्त करने तथा सीबीआई जांच की मांग
राजेश सिंह ने आगे बताया की जनजातीय विवि के कुलपति चयन प्रक्रिया की जांच सीबीआई जैसी शीर्ष केंद्रीय एजेंसियों से करवाई जाए। कार्यकारी परिषद की 67वीं बैठक में दस्तावेजों का समय पर वितरण नहीं किया गया, उपस्थिति रजिस्टर में गड़बड़ी हुई, और उम्मीदवारों का चयन पूर्वनियोजित तरीके से बिना विचार-विमर्श के किया गया। जिन शिक्षकों और अधिकारियों पर वैचारिक जासूसी, जातिवादी गुटबंदी और पूर्व निर्धारित लॉबिंग के आरोप हैं, उनके कॉल डिटेल्स और संपर्कों की फॉरेंसिक जांच अनिवार्य है। जनजातीय विश्वविद्यालय का नेतृत्व केवल शैक्षणिक योग्यता से नहीं, बल्कि नैतिक प्रतिबद्धता, राष्ट्रीय भावना, और जनजातीय संवेदना से तय होना चाहिए। यह आवश्यक है कि विश्वविद्यालय का कुलपति ऐसा हो, जो न केवल प्रखर विद्वान हो, अपितु राष्ट्रवादी मूल्यों का वाहक, ईमानदार प्रशासक, और आदिवासी उत्थान का सच्चा प्रतिनिधि हो। भाजपा यह मानती है कि शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, चरित्र निर्माण की भूमि है। महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, और सीबीआई निदेशक से अपील किया हैं कि वे इस विषय में शीघ्र हस्तक्षेप करें, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें।

